Essay on Pollution in Hindi

Essay on Pollution in Hindi – प्रदूषण पर निबंध

प्रदूषण पर निबंध (Essay on Pollution in Hindi) : जैसा कि हम सभी जानते हैं, प्रदूषण (Paryavaran Pradushan) आज के हर क्षण बदलते युग में संपूर्ण विश्व की सबसे बड़ी समस्या बन बैठी है। जिसका सामना ना केवल हमे करनी पड़ती है। बल्कि संपूर्ण विश्व को इससे जूझना पड़ रहा है।

तो आइए जानते हैं, इस जटिल समस्या के उत्पत्ति के कारण से लेकर समाधान तक के बारे में। और हमारी कोशिश है, कि मैं आप सब को इसके बारे में विस्तृत जानकारी दे सकूं।

Essay on Pollution in Hindi । प्रदूषण पर निबंध 

एक बात तो हम सभी भली-भांति जानते हैं, कि मनुष्य प्रकृति की सर्वोत्तम सृष्टि है। जब तक यह प्रकृति के कामो में बाधा नहीं डालता तब तक इसका जीवन स्वाभाविक गति से चलता है। परंतु जब मनुष्य प्रकृति के कामो में बाधा डालता है, तो मुश्किलें शुरू हो जाती है।

वस्तुतः हम कर सकते हैं, कि प्रकृति के कामो में अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण आज मानव-समाज को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

प्रदूषण (Paryavaran Pradushan) इनमें सर्वाधिक गंभीर समस्या है। या फिर हम यह भी कह सकते है, कि पर्यावरण मनुष्य की भौगोलिक एवं बौद्धिक उपज है।

अर्थात मानव जीवन को पर्यावरण की परिस्थितियां व्यापक रूप से प्रभावित करती है और यह बात भी सत्य है, कि वातावरण में अवस्थित किसी तत्व को मानव की गतिविधियां ही प्रभावित करती है। जो पर्यावरण के लिए खतरनाक होता है।

अगर मनुष्य पर्यावरण में अवस्थित संसाधनों का उपयोग सही ढंग से नहीं करें या उसका अत्यधिक दोहन करें तो अंततः इसका कुप्रभाव मनुष्य के साथ-साथ धरती पर रहने वाले सारे जीवो को झेलना पड़ता है।

जो कि आज के वर्तमान परिवेश में पर्यावरण के प्रभाव को संपूर्ण विश्व जल रही है जो है- प्रदूषण (Essay on Pollution in Hindi).

प्रदूषण क्या है – What is Pollution in Hindi?

प्रदूषण वास्तव में जलवायु या भूमि के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणो में कोई भी अवांछनीय परिवर्तन है। जिससे मनुष्य अन्य जीवो, औद्योगिक प्रक्रियाओ, सांस्कृतिक तत्वों तथा प्राकृतिक संसाधनों को हानि पहुंचती है।

दूसरे शब्दों में,

हम यह भी कह सकते हैं, कि प्रदूषण (Essay on Pollution in Hindi) का अर्थ है – हमारे चारों ओर की प्राकृतिक-भौतिक परिस्थितियों का बिगड़ना या प्रतिकूल होना। प्रकृति और उसका वातावरण इसलिए शुद्ध होता है, ताकि पृथ्वी पर संपूर्ण जीवजगत जीवित रह सके।

जब इसी वातावरण में जीवन के लिए आवश्यक तत्वों की मात्रा अपने निर्धारित अनुपात से कम हो जाती है या बढ़ जाती है, तो वह असंतुलन हानिकारक हो जाता है। पर्यावरण के इसी असंतुलन को प्रदूषण (Paryavaran Pradushan) कहा जाता है। सही मायने में कहा जाए तो निश्चित तौर पर प्रदूषण (Pradushan) की मूल समस्या मानव सभ्यता के विकास के साथ साथ बड़ी है।

प्रदूषण के प्रकार । Types of Pollution in Hindi

वैसे तो प्रदूषण कई प्रकार के होते हैं। परंतु मुख्य रूप से यह तीन प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. वायु प्रदूषण (Air Pollution)
  2. जल प्रदूषण (Water Pollution)
  3. ध्वनि प्रदूषण (Sound Pollution)

वायु प्रदूषण । Vayu Pradushan

Vayu Pradushan
Vayu Pradushan

यह बात तो हम सभी अच्छी तरह जानते हैं, कि वायु हमारे जीवन का आधार है। वायु के बिना एक पल भी हमारा जीवित रहना मुश्किल है। अफसोस की बात तो यह है, कि आज का मानव अपने जीवन के लिए परम आवश्यक हवा को अपने ही हाथों दूषित (Pollute) कर रहा है। वायु को जहरीला बनाने के लिए कल-कारखानों विशेष रूप से उत्तरदाई है।

कल-कारखाने से निकलने वाला विषैला धुआं वायुमंडल में जाकर अपना जहर घोल देता है। इस कारण आस-पास का वातावरण भी प्रदूषित हो जाता है।

इसके अतिरिक्त हवाई जहाजो, ट्रक, बस, कारों, रेलगाड़ियों आदि से निकलने वाला धुआं भी वातावरण को दूषित करता है। हालांकि इनका निर्माण मानव के श्रम और समय की बचत के लिए किया गया है।

संसार में जीवन से बढ़कर मूल्यवान कोई चीज नहीं हो सकती। यदि ये सारी सुविधाएं हमारे अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दे, तो प्रगति की अंधी दौड़ का महत्व ही क्या रह जाता है?

इसके लिए औद्योगिक क्षेत्र को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं होगा। मानव समाज में अनेक वर्ग है। वे भी इस के लिए जिम्मेवार हैं।

वायु प्रदूषण के कारण। Causes of Air Pollution in Hindi

कोयला तथा अन्य खनिज ईंधन जब भट्ठियों, कारखानों, बिजलीघरो, मोटर गाड़ियों और रेलगाड़ियों आदि में इस्तेमाल होते है। तब कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड की अधिक मात्रा वायु में पहुंचती है।

मोटर गाड़ियों से अधुरा जला हुआ खनिज ईंधन भी वायुमंडल में पहुंचता है। दरसल कार्बन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड धूल तथा अन्य यौगिक के सूक्ष्म कण प्रदूषण के रूप में हवा में मिल जाते हैं। इस दृष्टि से गाड़ियों को सबसे बड़ा प्रदूषणकारी माना गया है। वायु प्रदूषण सबसे अधिक व्यापक और हानिकारक है।

औद्योगिक अपशिष्ट (Industrial Waste)

महानगरों में औद्योगिक क्षेत्र तथा बड़ी संख्या में कल-कारखाने हैं। इन कारखानों में गंधक का अम्ल, हाइड्रोजन सल्फाइड, सीसा, पारा तथा अन्य रसायन उपयोग में लाए जाते हैं। इनमें रासायनिक कारखाने, तेल शोधक संयंत्र, उर्वरक, सीमेंट, चीनी, कांच, कागज इत्यादि के कारखाने शामिल हैं।

इन कारखानों से निकलने वाले प्रदूषण (Pradushan) कार्बन – मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, विभिन्न प्रकार के हाइड्रो कार्बन, धातु कण विभिन्न फ्लोराइड, कभी-कभी रेडियो-सक्रिय पदार्थों के कण, कोयले तथा तरल ईंधन के अज्वलनशील अंश वायुमंडल में प्रदूषक के रूप में पहुंचते रहते हैं।

धातुकर्मी प्रक्रम (Metallurgical Process)

विभिन्न धातु कर्म प्रक्रमो से बड़ी मात्रा में धूल-धुआं निकलते हैं। उनमें सीसा, क्रोमियम, बेरीलियम, निकेल, वैनेडियम इत्यादि वायु प्रदूषक उपस्थित होते हैं। इन शोध प्रक्रमो से जस्ता, तांबा, शीशा इत्यादि के कण भी वायुमंडल में पहुंचते रहते हैं।

कृषि रसायन (Agricultural Chemicals)

कीटो और बीमारियों से खेतो में लहलहाती फसलों की रक्षा के लिए हमारे किसान तरह-तरह के कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करते रहते हैं। यह दवाएं – कार्बनिक, फास्फेट, सीसा आदि होते है। यह रसायन वायु में जहर घोलने का काम करते हैं।

रेडियो विकिरण (Radio Radiation)

परमाणु ऊर्जा (Atomic Energy) प्राप्त करने के लिए अनेक देश परमाणु विस्फोट कर चुके हैं। इन देशों में परमाणु भट्ठियों का निर्माण हुआ है। इससे कुछ वायु प्रदूषक वायु में मिल जाते हैं। इसमे यूरेनियम, बेरिलियम, क्लोराइड, आयोडीन, ऑर्गन, स्ट्रासियम, कार्बन इत्यादि है।

वृक्षो तथा वनो का काटा जाना (Cutting of Trees and Forests)

पेड़-पौधे, वृक्ष लताएं पर्यावरण को शुद्ध करने के प्राकृतिक साधन है। गृह निर्माण, इमारती लकड़ी, फर्नीचर, कागज उद्योग तथा जलावन आदि के लिए वृक्षो की अंधाधुंध व अनियमित कटाई करने से वायु प्रदूषण में तेजी से वृद्धि हो रही है। इससे मानसून भी प्रभावित होता है, समय पर वर्षा नहीं होती, अतिवृष्टि तथा सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

वायु प्रदूषण का जन जीवन पर प्रभाव । Effect of Air Pollution on Life

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वायु प्रदूषण का मानव जीवन पर जो प्रभाव पड़ता है, वह इस प्रकार है-

सल्फर डाई-ऑक्साइड और कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैसे वर्षा के जल में घुलकर Acid rain बनाती है। एसिड रेन का अर्थ है – तेजाबी या अम्लीय वर्षा।

इस तेजाबी वर्षा में कार्बनिक अम्ल और सल्फ्यूरिक अम्ल का अत्यधिक प्रभाव होता है। इस प्रकार जब यह श्वसन क्रिया के द्वारा फेफड़ा में प्रवेश करती है। तब नमी सोखकर अम्ल बनाती है।

इससे फेफड़ों और श्वसन-नलिकाओ में घाव हो जाते हैं। इतना ही नहीं इनमें रोगाणु-युक्त धूल के कण फँसकर फेफड़े की बीमारियों को जन्म देते हैं। जब ये गैस पौधे की पत्तियों तक पहुंचती है, तो पत्तियों के ‘क्लोरोफिल’ को नष्ट कर देती है।

पौधों में पत्तियों का जो हरा रंग होता है, वह क्लोरोफिल की उपस्थिति के कारण ही होता है। यह क्लोरोफिल ही पौधा के लिए भोजन तैयार करता है।

इतना ही नहीं बल्कि इससे चर्म रोग होने की भी आशंका होती है। ‘ओजोन’ की उपस्थिति से पेड़ पौधे की पत्तियां शीघ्रता से स्वसन क्रिया करने लगती है। इस कारण अनुपात में भोजन की आपूर्ति नहीं हो पाती है। पत्तियाँ भोजन के अभाव में नष्ट होने लगती है।

यही कारण है, कि इनसे प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) नहीं हो पाता है। इससे वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा पर प्रभाव पड़ता है। मोटर गाड़ियो, औद्योगिक संयंत्रों, घरेलू चूल्हा तथा धूम्रपान से कार्बन डाई-ऑक्साइड तथा कार्बन-मोनोऑक्साइड वायु में मिल जाती है।

इस कारण श्वसण की क्रिया में रक्त में हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) के साथ मिलकर ऑक्सीजन को वहीं रोक देता है। फलत: हृदय रक्त संचार तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। हीमोग्लोबिन रक्त का आधार होता है। अगर ये जहरीली गैसे अधिक देर तक श्वास के साथ फेफड़ो में जाती रहे तो मृत्यु भी संभव है।

अवशिष्ट पदार्थों के जलने, रासायनिक उद्योगों की चिमनियों तथा पेट्रोलियम के जलने से प्राप्त नाइट्रोजन के ऑक्साइड तथा कुछ कार्बनिक गैस प्रकाश की उपस्थिति में ओजोन तथा अन्य प्रदूषक में बदल जाती है।

इसके प्रभावों से आंखों से पानी निकलने लगता है, सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है, वायुमंडल में कार्बन-डाइऑक्साइड की अधिकता से श्वसन में बाधा पड़ती है। पृथ्वी के धरातल के सामान्य से अधिक गर्म हो जाने की आशंका उत्पन्न हो जाती है।

नाइट्रस ऑक्साइड की उपस्थिति से आंख के रोगों में वृद्धि होती है। शीशे तथा कैडमियम के सूक्ष्म कण वायु में मिलकर विष का काम करते हैं।

लोहे के अयस्क तथा सिलिका के कण फेफड़ों की बीमारियों को जन्म देते हैं। रेडियोधर्मी विकिरण (Radioactive Radiation) से हड्डियों में कैल्शियम के स्थान पर स्ट्रॉसियम संचित हो जाते हैं। इसी तरह मांसपेशियों में पोटैशियम के स्थान पर कई खतरनाक तत्व इकट्ठे हो जाते हैं।

वायु प्रदूषण की रोकथाम । Prevention of Air Pollution in Hindi

वायु प्रदूषण (Essay on Pollution in Hindi) की रोकथाम उन स्थानों पर अधिक सरलता के साथ की जा सकती है। जहां से वायु में प्रदूषण उत्पन्न होता है।

आजकल कुछ ऐसे प्रदूषण नियंत्रण उपकरण उपलब्ध हैं, जिनसे प्रदूषण को रोका जा सकता है। विद्युत स्थैटिक अवक्षेपक, फिल्टर आदि ऐसे उपकरण है। जिन्हें औद्योगिक संयंत्रों में लगाकर वायु को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है।

वर्तमान में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए निम्नलिखित उपाय संभव है-

  • सल्फर डाइ-ऑक्साइड जैसे प्रदूषक इंधन में से गंधक को निकाल देने से अथवा परंपरागत इंधनो को न जला कर आधुनिक इंधनो का उपयोग करके। आधुनिक इंधनो में प्राकृतिक गैस, विद्युत भट्ठियां इत्यादि शामिल है।
  • मोटर गाड़ियों से निकलने वाले प्रदूषक को उत्प्रेरक परिवर्तक यंत्र लगाकर किया जा सकता है। ऊँची चिमनियाँ लगाकर पृथ्वी के धरातल पर प्रदूषक तत्व को एकत्र होने से रोका जा सकता है।
  • औद्योगिक संयंत्रों को आबादी से दूर स्थापित करके तथा प्रदूषण निवारक संयंत्र लगाकर वायु प्रदूषण पर नियंत्रण किया जा सकता है।
  • खाली और बेकार भूमि में अधिक संख्या में वृक्षारोपण कर तथा औद्योगिक क्षेत्रों में हरित पट्टी बनाकर काफी हद तक वायु प्रदूषण को रोका जा सकता है।
  • वैज्ञानिकों के मतानुसार यदि जनसंख्या का 75% वनक्षेत्र हो तो वायु प्रदूषण से हानि नहीं पहुंचती।

जल प्रदूषण । Jal Pradushan

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Jal Pradushan

जल हमारे जीवन के लिए बहुत ही आवश्यक है। मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षियों के लिए भी जल जीवन का आधार है। पेड़ पौधे भी आवश्यक तत्व जल से ही घुली अवस्था में ग्रहण करते हैं। कोई भी जीव बिना जल के जीवित नहीं रह सकता।

भोजन करने के बाद अथवा किसी काम को करने के बाद मानव शरीर में गर्मी बढ़ जाती है। इस गर्मी की तृप्ति जल से ही होती है। मानव के प्रत्येक कार्य में जल की सर्वाधिक उपयोगिता है।

जल में अनेक कार्बनिक, अकार्बनिक पदार्थ, खनिज तत्व, व गैस घुली होती है। यदि इन तत्वों की मात्रा आवश्यक से अधिक या कम हो जाती है। तो जल हानिकारक हो जाता है,और इस जल को हम प्रदूषित कहते हैं।

जिस क्षेत्र में हवा और पानी दूषित हो जाते हैं। वहां जीव धारियों का जीवन संकट में पड़ जाता है। बीसवीं शताब्दी में मानव सभ्यता और विज्ञान प्रौद्योगिकी का बड़ी तेजी से विकास हुआ।

बेशक मानव जीवन इससे उन्नत और सुखकर हुआ। वही काफी हानि भी हुई है। आज वायु, जल, आकाश का अंधाधुन और अनियंत्रित दोहन हो रहा है। इस कारण मानव अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है।

गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी मानी जाती है। वह स्वर्गलोक की यात्रा कराने वाली नदी मानी जाती है। गंगा अनेक पापों को धोनेवाली नदी मानी जाती है। वही जीवनदाई गंगा आज कल-कारखानों के जहरीले कूड़े-कचरे से प्रदूषित हो गई है। भारत सरकार ने गंगा की सफाई के लिए व्यापक कार्यक्रम भी चला रखा है।

स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी की अध्यक्षता में केंद्रीय गंगा प्राधिकरण का गठन भी हुआ। किंतु अभी तक उनकी निर्मलता लौटी नहीं है। यही हाल अन्य नदियों का भी है।

जल मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से प्रदूषित होता है-

जल के स्थिर रहने से, जल में नगर की गंदी नालियों और नालों का जल मिलने से, जल में विभिन्न प्रकार के खनिज, लवणों के मिलने से, ताल-तलैया के जल में साबुन, शैंपू आदि से नहाने तथा कपड़े धोने से, जल स्रोतों में कारखानों व फैक्ट्रियों आदि से रसायनों का स्त्राव होने से, भारत में लगभग 1700 ऐसे उद्योग है, जिनके लिए व्यर्थ जल उपचार की आवश्यकता होती है।

मनुष्य के शरीर मे जल की मात्रा लगभग 70% होती है। यह वह जल है, जो हमें प्रकृति (Nature) से मिलता है। इसे चार भागों में बांटा गया है –

  1. पहले वर्ग के अंतर्गत वर्षा का जल आता है।
  2. दूसरे वर्ग में नदी का जल आता है।
  3. तीसरे वर्ग के अंतर्गत कुए अथवा सोते (ताल-तलैया) का जल आता है।
  4. चौथे वर्ग के अंतर्गत समुद्र का जल शामिल है।

जल प्रदूषण का जन जीवन पर प्रभाव । Effect of water Pollution on Life

जल के प्रदूषित हो जाने के कारण आज के दौड़ में संपूर्ण विश्व को इस समस्या से जूझना पड़ रहा है। जल प्रदूषण के कारण जन जीवन को बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जिनमें कुछ निम्नलिखित हैं-

जल के प्रदूषित हो जाने के कारण पीने योग्य जल की मात्रा कम पर गई है। ऐसी स्थिति में ऐसे जल के उपयोग से लोगों को पीलिया, आंतों के रोग, चर्म रोग एवं लकवा जैसी खतरनाक बीमारियों का शिकार होना पड़ जाता है।

निम्नलिखित उपायों द्वारा जल प्रदूषण (Jal Pradushan) को रोका जा सकता है-

समय-समय पर कुआ में लाल दवा का छिड़काव करके, कुआं को जाल आदि के द्वारा ढक कर ताकि इसमें कूड़ा करकट और गंदगी ना जा सके, जल संग्रह की जाने वाली टंकीयों तथा हौज को समय-समय पर साफ करके, औद्योगिक इकाइयों में ट्रीटमेंट प्लांट लगाना अनिवार्य कर देना चाहिए, कूड़े-कचरे एवं मल मूत्र को नदी में न बहाकर नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल करके उनमें उर्जा पैदा की जाए और खाद बनाई जाए।

ध्वनि प्रदूषण । Dhwani Pradushan

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Dhwani Pradushan

आज समूचे विश्व में ध्वनि प्रदूषण (Essay on Pollution in Hindi) की समस्या हलचल मचाए हुए हैं। क्षेत्रीय पर्यावरण में इसका बड़ा प्रतिकूल असर पड़ता है।

मानसिक रोगों को बढ़ाने एवं कान, नाक, गला आदि के रोगों में शोर की जबरदस्त भूमिका है। तीखी ध्वनि को शोर कहा जाता है। शोर की तीव्रता को मापने के लिए डेसीबल की व्यवस्था की गई है।

सामान्य रूप से कहा जाए तो 90 डेसीबल से अधिक डेसीबल की ध्वनि ध्वनि प्रदूषण (Sound Pollution in Hindi) कहलाता है। आज के दौड़ में चाहे विमान की गड़गड़ाहट हो अथवा रेलगाड़ी की सीटी, चाहे कार का हार्न हो अथवा लाउडस्पीकर की चीख कहीं भी शोर हमारा पीछा नहीं छोड़ता, यही कारण है कि दिनों दिन प्रदूषण फैलता ही जा रहा है।

ध्वनि प्रदूषण (Dhwani Pradushan) के निम्नलिखित कारण हैं-

ध्वनि प्रदूषण के कई कारण हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं – अनेक प्रकार के वाहन, लाउडस्पीकर, बाजे एवं औद्योगिक संस्थानों की मशीनों से ध्वनि प्रदूषण होता है। परमाणु शक्ति उत्पादन व नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) आदि के द्वारा ध्वनि प्रदूषण होता है।

ध्वनि प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव । Effect of Sound Pollution on Life

ध्वनि प्रदूषण के निम्नलिखित प्रभाव जन जीवन पर देखने को मिलता है – शोर से दिलों दिमाग पर असर पड़ता है, इससे हमारी धमनियां सिकुड़ जाती है, हृदय धीमी गति से काम करने लगता है, गुर्दा पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ने लगता है, लगातार शोर से कोलेस्टेरॉल (Cholesterol) बढ़ जाता है। इससे रक्त शिराओं में हमेशा के लिए खींचा पैदा हो जाता है।

इससे दिल का दौड़ा पड़ने की आशंका बनी रहती है। अधिक शोर से स्नायु तंत्र प्रभावित होता है, दिमाग पर इसका बुरा असर पड़ता है, बच्चों पर शोर का इतना बुरा प्रभाव पड़ता है, कि उन्हें न केवल ऊँचा सुनाई पड़ता है, बल्कि उनका स्नायु तंत्र भी प्रभावित हो जाता है।

परिणामस्वरुप बच्चे का सही ढंग से मानसिक विकास (Mental Growth) नहीं हो पाता है। असह्य शोर का संतानोत्पत्ति पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। अगर गर्भवती महिला गर्भावस्था के दौरान लगातार शोरगुल के बीच रहे तो उनके भ्रूण पर भी बुरा असर पड़ता है।

ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण निम्नलिखित उपायों द्वारा पाया जा सकता है-

ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए, इसे रोकने के लिए ध्वनि विहीन वाहन बनाया जाए, झुग्गी-झोपड़ी और कॉलोनियों का निर्माण इस प्रकार हो, कि वे सड़क से काफी फासले पर रहे। ध्वनि प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक बनाने के लिए जन-जागरण कार्यक्रम बनाया जाए।

विवाह समारोह एवं पार्टी आदि के समय तेज वाद्य यंत्र बजाने पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाया जाए। पर्व त्योहार या अन्य खुशी के मौके पर अधिक शक्तिशाली पटाखे के चालने पर रोक लगाई जाए। वाहनों के हार्न को अनावश्यक रूप से बजाने पर रोक लगाई जाए।

उपसंहार (Conclusion)

इस प्रकार से हम देखते हैं, कि आधुनिक युग में प्रदूषण (Pradushan) की समस्या अत्यधिक भयंकर रूप धारण करती जा रही है। यदि इस समस्या का निराकरण समय रहते ना किया गया तो एक दिन ऐसा आएगा, जब प्रदूषण की समस्या संपूर्ण मानव जाति को निकल जाएगी।

इसलिए प्रदूषण से मुक्ति के लिए पूरी धरती के लोगों को सहमत होकर प्रयास करना होगा।

5 जून को सारे विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जाता है और यह दिवस पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए मनाया जाता है।

परंतु इसका कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिलता और सबसे बड़ी बात तो यह है, कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए बिना मानव समाज की प्रगति संभव नहीं है। मानव का भविष्य तो तभी निरोगी, सुखी और स्वस्थ्य रह सकता है जब वातावरण की प्रदूषण से रक्षा हो सके।

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Pradushan सम्बंधित कुछ FAQs

  1. प्रदूषण क्या है?

    हमारे चारों ओर की प्राकृतिक-भौतिक परिस्थितियों का बिगड़ना या प्रतिकूल होना ही प्रदूषण कहलाता है।

  2. प्रदूषण के क्या कारण है?

    वनों की अंधाधुंध कटाई, औद्योगिक उत्सर्जन, कृषि रसायन, नाभिकीय विखंडन आदि प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।

  3. प्रदूषण कितने प्रकार के होते हैं?

    प्रदूषण मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं। जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण

  4. प्रदूषण से कैसे बचें?

    अधिक से अधिक पेड़ पौधे लगाएं।
    बाहर निकलते समय चेहरे पर मास्क लगाएं।
    अपने भोजन में ज्यादा से ज्यादा ओमेगा 3 और विटामिन सी वाले चीजों को शामिल करें।

  5. विश्व पर्यावरण दिवस कब मनाया जाता है?

    5 जून को प्रतिवर्ष विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

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